हिंदी व्याख्या
छावा: संभाजी महाराज की शौर्य गाथा
14 फरवरी के दिन, जहाँ मार्वल स्टूडियोज़ ने “कैप्टन अमेरिका: ब्रेव न्यू वर्ल्ड” रिलीज़ की थी, वहीं “मुजिया” और “स्त्री” फ़िल्मों के निर्माताओं ने “छावा” को रिलीज़ किया। यह फ़िल्म छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र, संभाजी महाराज की जीवन-गाथा पर आधारित है। इस मूवी में हमें संभाजी महाराज की पूरी जीवनी दिखाई गई है, जिसका अर्थ है कि यह फ़िल्म हमारे इतिहास से संबंधित है। “छावा” की ख़ासियत की बात करें, तो फ़िल्म के सभी अभिनेताओं का अभिनय बहुत ही शानदार था, फ़ाइट सीन बेहतरीन थे और फ़िल्म का एक्शन भी ज़बरदस्त था।
यदि आप में से कोई भी इस “छावा” फ़िल्म को थिएटर में नहीं देख पाए, तो अब आपको चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मैं इस वीडियो में “छावा” फ़िल्म की पूरी कहानी विस्तार से बताने वाला हूँ। यदि आपको यह वीडियो और फ़िल्म की कहानी पसंद आती है, तो कृपया इसे लाइक करें और कमेंट बॉक्स में “छावा” ज़रूर लिखें। जिन्होंने अभी तक चैनल को सब्सक्राइब नहीं किया है, वे जल्दी से चैनल को सब्सक्राइब कर लें और सब्सक्राइब बटन के बगल में बनी घंटी को भी ऑल पर सेट कर लें, ताकि आप हमारे चैनल के सभी नवीनतम वीडियो सबसे पहले देख सकें।
इतिहास का पृष्ठभूमि और औरंगज़ेब का उदय
“छावा” फ़िल्म की कहानी वर्ष 1680 से शुरू होती है, लेकिन फ़िल्म की शुरुआत में हमें 1680 से पहले का इतिहास दिखाया जाता है। हमें पता चलता है कि 16वीं शताब्दी तक भारत के अधिकांश क्षेत्रों पर भारतीय राजाओं का शासन था। परंतु 16वीं शताब्दी में बाबर ने पहली बार भारत पर कब्ज़ा किया, और उसी ने मुग़ल साम्राज्य की नींव रखी। इसके बाद आगे चलकर मुग़ल सम्राटों ने ही भारत पर शासन किया। ये सभी मुग़ल सम्राट अत्यंत क्रूर थे, और इसीलिए वे भारतीयों पर बहुत अत्याचार करते थे। इसी मुग़ल साम्राज्य का छठा सम्राट औरंगज़ेब था, जो सभी मुगलों में सबसे अधिक क्रूर था। उसने भारत के लोगों को बहुत परेशान किया था।
लेकिन फिर यहीं इतिहास में शिवाजी महाराज की एंट्री होती है, जिनका असली नाम शिवाजी भोसले था। शिवाजी भोसले मराठा साम्राज्य के संस्थापक थे, क्योंकि उन्होंने भारत में मराठा साम्राज्य की स्थापना की थी। जब वे पूरे मराठा साम्राज्य के राजा बने, तो उनका नाम छत्रपति शिवाजी महाराज पड़ा। छत्रपति शिवाजी महाराज की सोच औरंगज़ेब से बिल्कुल विपरीत थी। जहाँ औरंगज़ेब सभी पर कब्ज़ा करके उन्हें अपने हिसाब से रखता था, वहीं शिवाजी महाराज स्वराज में विश्वास करते थे — एक ऐसा राज्य जहाँ सभी इंसानों को बराबर के अधिकार मिलें और हर इंसान अपनी ज़िंदगी के फ़ैसले ख़ुद ले सके। अपनी इसी स्वराज की सोच के साथ छत्रपति शिवाजी महाराज ने मराठा साम्राज्य को काफ़ी बड़ा कर दिया था। इस दौरान औरंगज़ेब ने उन्हें मारने की कई कोशिशें कीं, लेकिन जितनी बार भी उसने शिवाजी महाराज से लड़ने की कोशिश की, उतनी बार शिवाजी महाराज ने उसकी सेना को हरा दिया और हर बार औरंगज़ेब को हार का सामना करना पड़ा। और दोस्तों, यह “छावा” फ़िल्म इन्हीं छत्रपति शिवाजी महाराज के बेटे संभाजी महाराज पर आधारित है।
संभाजी का शौर्य और औरंगज़ेब की बौखलाहट
इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बाद, हम दिल्ली का लाल किला देखते हैं, और हमें पता चलता है कि यह साल 1680 है। इस समय औरंगज़ेब लाल किले से पूरे भारत पर नियंत्रण बनाए हुए था। लेकिन थोड़ी देर बाद ही औरंगज़ेब को यह ख़बर मिलती है कि मराठा साम्राज्य के राजा छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु हो चुकी है। जैसे ही यह ख़बर औरंगज़ेब के दरबार में पहुँचती है, दरबार के सभी लोग ख़ुश होते हैं, और औरंगज़ेब भी इस ख़बर से प्रसन्न होकर सभी को पार्टी देता है।
इसके बाद, दृश्य बदलता है और हम सीधे मध्य प्रदेश के एक शहर बुरहानपुर को देखते हैं। बुरहानपुर में हम देखते हैं कि वहाँ मुग़ल साम्राज्य के कई सैनिक मौजूद हैं। हमें यह भी पता चलता है कि बुरहानपुर औरंगज़ेब का सबसे पसंदीदा शहर था। बुरहानपुर के किले के अंदर जितने भी सैनिक थे, वे भी शिवाजी महाराज की मृत्यु की ख़बर सुनकर काफ़ी ख़ुश थे। लेकिन अचानक उन्हें एहसास होता है कि मराठा साम्राज्य के कई सैनिक उन पर हमला करने आ रहे हैं। यह बात जानते ही सभी सैनिक जल्दी से तैयार होते हैं और अपने हथियार लेकर किले के बाहर जाते हैं ताकि वे मराठा साम्राज्य के सैनिकों का सामना कर सकें।
लेकिन जब मराठा साम्राज्य के सैनिक पास आते हैं, तो मुग़ल सैनिक यह देखते हैं कि उनके सामने मराठा साम्राज्य का कोई सैनिक नहीं है, बल्कि सिर्फ़ घोड़े हैं। ऐसा इसलिए था, क्योंकि मराठा साम्राज्य के सैनिकों ने उनके सामने घोड़े छोड़ दिए थे ताकि सभी का ध्यान घोड़ों पर जाए। इतने में हम देखते हैं कि मराठा साम्राज्य के सैनिक अगल-बगल के रास्तों से किले के अंदर घुस जाते हैं और देखते ही देखते मुग़ल सैनिकों पर हमला कर देते हैं। इसके बाद सभी सैनिकों की लड़ाई शुरू होती है।
फिर वहाँ जितने भी मराठा साम्राज्य के सैनिक होते हैं, उनके बीच से छावा यानी शिवाजी महाराज के बेटे संभाजी महाराज की एंट्री होती है। जैसा कि आप सब जानते हैं कि संभाजी महाराज का किरदार विक्की कौशल ने निभाया है। हम देखते हैं कि संभाजी महाराज के साथ काफ़ी कम सैनिक होते हैं, लेकिन फिर भी वे देखते ही देखते मुग़ल सैनिकों को पीटने लगते हैं। यहाँ मुग़ल सैनिकों का जो लीडर होता है, उसका सामना सीधे संभाजी से होता है, लेकिन वह इस लड़ाई में एक चाल का उपयोग करता है और संभाजी महाराज को एक नीचे के तहखाने में गिरा देता है। जब संभाजी उस तहखाने में गिरते हैं, तो वह देखते हैं कि वहाँ एक शेर है, जो देखते ही देखते संभाजी पर हमला कर देता है।
लेकिन दोस्तों, यहाँ हम संभाजी की ताक़त और बहादुरी देखते हैं, और हमें पता चलता है कि संभाजी महाराज देखते ही देखते उस शेर को ढेर कर देते हैं। जब आख़िर में वह शेर नहीं मानता, तो संभाजी अपने दोनों हाथों से उसके दाँत पकड़ते हैं और अपनी हाथों की ताक़त से उसका मुँह चीर देते हैं। शेर को मारने के बाद संभाजी बाहर निकलते हैं और वहाँ के सभी मुग़ल सैनिकों को हरा देते हैं। फिर इन सब के बाद, संभाजी वहाँ के सैनिकों के लीडर को घुटनों पर लाते हैं और उसे ज़िंदा छोड़कर उससे कहते हैं कि जब औरंगज़ेब यहाँ आए, तो उसे बता देना कि यह सारा काम शिवाजी के बेटे संभाजी ने किया है। औरंगज़ेब यह ज़रा भी न सोचे कि शिवाजी के मरने के बाद मराठा साम्राज्य कमज़ोर हुआ है, बल्कि बेशक शिवाजी महाराज, जो कि एक शेर थे, वह मर गए हैं, लेकिन उस शेर का बेटा यानी कि छावा अभी भी ज़िंदा है। और इस छावा के ज़िंदा रहते औरंगज़ेब कभी भी मराठा साम्राज्य को हरा नहीं सकता है।
यह सब करने के बाद, संभाजी अपनी पूरी सेना लेकर वापस चले जाते हैं। इसके बाद, जैसे ही औरंगज़ेब को इस बारे में पता चलता है, वह जल्दी से बुरहानपुर आता है। यहाँ आकर वह देखता है कि उसके पसंदीदा शहर को संभाजी महाराज और उनके सभी सैनिकों ने जहन्नुम बना दिया है। यह सब देखकर औरंगज़ेब को बहुत गुस्सा आता है, और इसीलिए वह अपनी सेना को आदेश देता है कि वे सब लोग जल्दी से तैयारी करें और मराठा साम्राज्य पर हमला करें, पूरे मराठा साम्राज्य को बर्बाद करके संभाजी महाराज को क़ैद कर लें और उसे उसके पास लेकर आएं। फिर हम भी देखते हैं कि औरंगज़ेब के कहने पर उसकी सेना तैयारी करने लगती है और जल्दी से जल्दी मराठा साम्राज्य की ओर निकल जाती है।
संभाजी का राज्याभिषेक और षड्यंत्र
इसके बाद, दृश्य बदलता है और हम सीधे मराठा साम्राज्य को देखते हैं। मराठा साम्राज्य के अंदर हम सीधे महाराष्ट्र के रायगढ़ किले को देखते हैं, जहाँ रहकर संभाजी महाराज पूरे मराठा साम्राज्य पर शासन करते हैं। इस रायगढ़ किले में संभाजी अपनी पूरी सेना के साथ लौटते हैं। उनके यहाँ आने के बाद, हम मराठा साम्राज्य के कई महत्वपूर्ण पात्रों को देखते हैं।
यहाँ हम सबसे पहले संभाजी की पत्नी, येशूबाई से मिलते हैं, जिन्हें फ़िल्म में रश्मिका मंदाना ने निभाया है। इसके साथ ही, हम संभाजी महाराज की सौतेली माँ, सोयराबाई से भी मिलते हैं, और उनका एक 11 साल का बेटा भी होता है जिसका नाम राजाराव होता है। यह राजाराम संभाजी का सौतेला छोटा भाई होता है। इनके अलावा, हम कई अन्य महत्वपूर्ण पात्रों से भी मिलते हैं, जिनमें मराठा साम्राज्य के सेना प्रमुख, सर सेनापति शामिल हैं, जिन्हें अभिनेता आशुतोष राणा ने निभाया है, और साथ ही हम संभाजी के एक मित्र, कवि कलश से भी मिलते हैं, जिन्हें अभिनेता विनीत कुमार सिंह ने निभाया है।
अब दोस्तों, यहाँ हम देखते हैं कि छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु की वजह से मराठा साम्राज्य के लोगों और सैनिकों को थोड़ा दुख तो होता है, लेकिन उन सभी को शिवाजी महाराज के बेटे संभाजी महाराज के नया राजा बनने की खुशी भी होती है। इसीलिए अगले दृश्य में हम देखते हैं कि मराठा साम्राज्य के अंदर संभाजी महाराज का राज्याभिषेक किया जाता है और उन्हें मराठा साम्राज्य का नया राजा यानी कि नया छत्रपति बनाया जाता है, जिसके बाद संभाजी छत्रपति संभाजी महाराज कहलाते हैं।
यहाँ हम देखते हैं कि संभाजी के नया छत्रपति बनने की वजह से सभी लोग काफी ख़ुश होते हैं, लेकिन संभाजी की सौतेली माँ, सोयराबाई, उनके राजा बनने से बिल्कुल भी ख़ुश नहीं होती हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि वह अपने बेटे राजाराम को ही राजा बनते हुए देखना चाहती थीं। और इसीलिए दोस्तों, सोयराबाई यह योजना बनाती हैं कि वह संभाजी महाराज को मरवा देंगी ताकि संभाजी के मरते ही उनका बेटा राजा बने। इस काम के लिए, हम देखते हैं कि मराठा साम्राज्य के पाँच वरिष्ठ स्तर के मंत्री इस काम में सोयराबाई के साथ मिले होते हैं, और इसीलिए ये पाँचों भी सोयराबाई के साथ मिलकर संभाजी को मारने की योजना बनाने लगते हैं।
अकबर का पलायन और संभाजी का अटल वचन
लेकिन अब इसके बाद ही दृश्य बदलता है, और हम संभाजी की पत्नी के दो भाइयों से मिलते हैं, यानी संभाजी महाराज के सालों से। यहाँ संभाजी के ये दोनों साले उनसे मिलकर कहते हैं कि वे शिवाजी महाराज और संभाजी महाराज के स्वराज की सोच से काफी ख़ुश हैं, लेकिन असल में वे चाहते हैं कि वे जिन क्षेत्रों के नेता हैं, उन्हें उस क्षेत्र का पूरा नियंत्रण दे दिया जाए ताकि वे लोग उस क्षेत्र को अपने हिसाब से चला सकें। लेकिन दोस्तों, हम देखते हैं कि संभाजी महाराज ऐसा करने से मना कर देते हैं, और ऐसा इसीलिए क्योंकि अगर संभाजी ने उन्हें अपने इलाक़े को अपने हिसाब से चलाने दिया, तो इस चीज़ की माँग बाकी लोग भी करेंगे, और अगर ऐसा होता है तो स्वराज यानी कि लोगों का राज कभी नहीं आएगा। और इसीलिए स्वराज की ख़ातिर संभाजी ऐसा करने से मना कर देते हैं। लेकिन दोस्तों, हम देखते हैं कि संभाजी के मना करने की वजह से संभाजी के दोनों सालों को काफी गुस्सा आता है, और वे मन ही मन संभाजी से जलने लगते हैं।
लेकिन अब इसी समय पर हम दूसरी तरफ औरंगज़ेब को देखते हैं, जहाँ हमें पता चलता है कि औरंगज़ेब के कई बच्चों में उसका एक बेटा था जिसका नाम अकबर था। यह अकबर औरंगज़ेब को धोखा देकर राजा बनना चाहता था, जिसके लिए उसका यह प्लान था कि वह अपने पिता को मार दे और मुग़ल साम्राज्य का नया राजा बन जाए। लेकिन जब औरंगज़ेब को इस बारे में पता चला, तब उसके बेटे अकबर की जान ख़तरे में आ गई, और इसीलिए अकबर वहाँ से भाग गया और वह अपने कई सैनिकों के साथ मिलकर मराठा साम्राज्य में घुस गया।
मराठा साम्राज्य में आने के बाद ही अकबर सीधे संभाजी से मिलने को बुलाता है और उनसे बातचीत करता है। उनसे बात करके वह संभाजी से कहता है कि वह जानता है कि संभाजी का दुश्मन भी औरंगज़ेब ही है, और साथ ही वह भी अपने पिता औरंगज़ेब को मारना चाहता है। और इसीलिए उसका यह प्लान है कि वह और संभाजी साथ मिल जाएँ और वे लोग मिलकर औरंगज़ेब को ख़त्म कर दें। लेकिन दोस्तों, हम देखते हैं कि संभाजी ऐसा करने से मना कर देते हैं, और संभाजी अकबर से सीधे कहते हैं कि मराठा कभी भी मुगलों का साथ नहीं देते, क्योंकि कोई भी मुग़ल विश्वास के काबिल नहीं है।
यह बोलकर संभाजी वहाँ से जाने लगते हैं, लेकिन फिर उसी समय पर अकबर संभाजी को एक लिखित कागज़ दिखाता है, और वह कागज़ संभाजी को पढ़ने के लिए देता है। जिसके बाद जब संभाजी उस कागज़ को पढ़ते हैं, तो उन्हें यह पता चलता है कि उस कागज़ का जो पत्र है, वह उनकी सौतेली माँ सोयराबाई ने लिखा है, और यह पत्र सोयराबाई ने अकबर को भिजवाया होता है। उस पत्र में यह लिखा होता है कि अकबर संभाजी को मारने में सोयराबाई की मदद करें, और अगर अकबर संभाजी को मार देता है, तो उसके बाद सोयराबाई मुग़ल साम्राज्य का नया राजा अपने बेटे को बनाएगी, और जब उसका बेटा राजाराम नया राजा बन जाएगा, तब अकबर को मुग़ल साम्राज्य का जितना हिस्सा चाहिए होगा, वह उसे ख़ुशी-ख़ुशी दे देगी।
इन सारी बातों को पढ़ने के बाद ही संभाजी को बहुत बड़ा धक्का लगता है, और अब क्योंकि अकबर ने संभाजी को एक सच्चाई बताई होती है, इसीलिए संभाजी अकबर का साथ तो नहीं देते, लेकिन वह अकबर को एक वचन देते हैं, और वह अकबर से कहते हैं कि वह जानता है कि औरंगज़ेब यानी कि उसका बाप उसके पीछे पड़ा है, और अगर अकबर औरंगज़ेब के हाथ पड़ा तो वह उसे मार देगा। लेकिन संभाजी अकबर को यह वचन देते हैं कि जब तक वह मराठा साम्राज्य की ज़मीन पर खड़ा है, तब तक औरंगज़ेब उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है, और अगर औरंगज़ेब या फिर उसकी सेना का कोई भी सदस्य उसे मारने आता है, तो संभाजी ख़ुद अकबर की सुरक्षा करेगा।
यह वचन देने के बाद ही संभाजी जल्दी से रायगढ़ अपने महल में आते हैं, और फिर वह जल्दी से उन पाँचों आदमियों को ढूँढ लेते हैं जिन्होंने संभाजी को मारने के प्लान में सोयराबाई का साथ दिया था। उन पाँचों को ढूँढकर संभाजी उन पाँचों को हाथी से कुचलवा कर मार देते हैं, क्योंकि उन सब ने अपने राजा को मारने का प्लान बनाया था, जो कि एक बहुत ही बड़ा अपराध होता है। लेकिन अगर बात करें सोयराबाई की, तो सोयराबाई संभाजी की सौतेली माँ थीं, और संभाजी उनसे बहुत ज़्यादा प्यार करते थे, और इसीलिए संभाजी उनसे कुछ नहीं कहते हैं। लेकिन जब सोयराबाई अपने कमरे में सो रही होती हैं, तब संभाजी उनके पास जाते हैं, और वह उनके पैर छूकर यह प्रार्थना करते हैं कि उनकी माँ यानी कि सोयराबाई अपनी ज़िंदगी में जो भी चाहें, उन्हें वह मिल जाए, और भगवान उनकी सारी इच्छाओं को पूरा करें।
मुगलों का हमला और गुरिल्ला युद्ध
लेकिन दोस्तों, इसके बाद ही हम देखते हैं कि औरंगज़ेब ने मराठा साम्राज्य पर हमला करने के लिए जो लाखों की सेना भेजी थी, वह देखते ही देखते मराठा साम्राज्य तक पहुँच जाती है। और फिर मुग़ल साम्राज्य के सभी सैनिक मराठा साम्राज्य में घुसकर वहाँ के सभी गाँवों को नष्ट करने लगते हैं और सभी आम लोगों को जान से मार देते हैं। वे मर्दों को मारते हैं, औरतों को मारते हैं, बूढ़ों को मारते हैं, और यहाँ तक कि सभी बच्चों को भी मारने लगते हैं। साथ ही साथ वे उनके घरों को लूट लेते हैं और लूटकर उन सबके घर को आग भी लगा देते हैं। हम यह देखते हैं कि वे सभी मुग़ल सैनिक देखते ही देखते मराठा साम्राज्य के सभी गाँवों को नष्ट करने लगते हैं।
लेकिन अब इन सबके बारे में जैसे ही संभाजी को पता चलता है, वैसे ही वह उन सभी मुग़ल सैनिकों को रोकने का और उन्हें हराने का प्लान बनाते हैं। लेकिन उन्हें यह पता चलता है कि मुग़ल साम्राज्य के सैनिक लाखों की संख्या में हैं, और मराठा साम्राज्य के सैनिक सिर्फ़ और सिर्फ़ 25,000 हैं। लेकिन सिर्फ़ 25,000 होने के बाद भी मराठा साम्राज्य के सभी सैनिक उन लाखों सैनिकों से लड़ने के लिए तैयार होते हैं। लेकिन संभाजी सीधी लड़ाई से मना कर देते हैं, क्योंकि वह यह जानते हैं कि सीधी लड़ाई में शायद वे उन सभी मुग़ल सैनिकों को हरा तो देंगे, पर ऐसा करने में मराठा साम्राज्य के भी काफी सैनिक मारे जाएँगे, और संभाजी ऐसा नहीं चाहते थे। और इसके लिए वह यह तय करते हैं कि वह मुग़ल सैनिकों को हराने के लिए गुरिल्ला युद्ध (Guerrilla Warfare) का उपयोग करेंगे।
अब दोस्तों, यह जो गुरिल्ला युद्ध होता है, यह युद्ध का एक ऐसा तरीक़ा होता है जिसमें दुश्मन से सामने से नहीं लड़ा जाता है, बल्कि इसमें दुश्मन पर छिपकर वार किया जाता है और बिल्कुल तेज़ी से दुश्मन को ख़त्म कर दिया जाता है। और दोस्तों, मैं आपको बता दूँ कि यह जो गुरिल्ला युद्ध है, इसकी शुरुआत भारत में शिवाजी महाराज ने की थी, और इसीलिए मराठा साम्राज्य के सैनिक गुरिल्ला युद्ध के बारे में काफी बढ़िया से जानते हैं।
यह तय करने के बाद ही संभाजी और उनके मराठा साम्राज्य के सभी सैनिक मिलकर मुग़ल सैनिकों को घेर-घेर कर मारते हैं। मुग़ल सैनिक अगर जंगल में होते हैं, तो वे लोग जंगल में छिपकर मारते हैं, और अगर वे लोग पहाड़ों पर होते हैं, तो मराठा साम्राज्य के सैनिक उन्हें पहाड़ों पर छिप-छिपकर मारते हैं। और इस तरह से देखते ही देखते वे सभी मुग़ल सैनिकों को मारने लगते हैं। पर यह देखकर औरंगज़ेब और सैनिक भेजता है, लेकिन मराठा साम्राज्य के सैनिक उन्हें भी धीरे-धीरे करके ख़त्म कर देते हैं।
और इस तरह से धीरे-धीरे करके आठ साल बीत जाते हैं, यानी कि आठ सालों तक इसी तरह की लड़ाई चलती रहती है, लेकिन हर एक लड़ाई को मराठा साम्राज्य के सैनिक ही जीतते हैं। पर आठ सालों बाद औरंगज़ेब को यह पता चलता है कि इस तरीक़े से हार-हार कर उसकी जो सैनिकों की सेना है, वह आधी हो गई है। साथ ही साथ उसके ख़ज़ाने का स्टॉक भी काफी कम हो गया है, क्योंकि उसने लड़ने में अपना काफी सारा पैसा गँवा दिया है। लेकिन जब इन सारी बातों से मुग़ल साम्राज्य परेशान होता है कि अब उन्हें आगे क्या करना चाहिए, तब उसी समय पर उनके साथ अचानक से एक बड़ी अजीब सी घटना होती है, और वह घटना यह होती है कि जो संभाजी के दो साले होते हैं, वे सीधे औरंगज़ेब से मिलने आते हैं।
संगमेश्वर का विश्वासघात और संभाजी का बलिदान
औरंगज़ेब से मिलकर संभाजी के दोनों साले उससे कहते हैं कि औरंगज़ेब की तरह ही वे लोग भी संभाजी को जान से मारना चाहते हैं, और इसीलिए संभाजी को मारने में वे लोग औरंगज़ेब की मदद करेंगे। बस बदले में वे लोग यह चाहते हैं कि संभाजी को मारने के बाद मराठा साम्राज्य के अंदर उनका जो क्षेत्र है, औरंगज़ेब उन्हें वह क्षेत्र पूरी तरह से सौंप दे, और आगे भी उनसे वह क्षेत्र कभी न छीने, ताकि वे दोनों अपने क्षेत्र को अपने हिसाब से शासन कर सकें। अब औरंगज़ेब इस प्रस्ताव को मान जाता है, जिसके बाद उन दोनों की डील हो जाती है और संभाजी के दोनों साले औरंगज़ेब से मिल जाते हैं।
इधर दूसरी तरफ मराठा साम्राज्य में हम यह देखते हैं कि मराठा साम्राज्य के सैनिक धीरे-धीरे करके सभी युद्धों को जीतते जा रहे थे, और ऐसा कर करके उन्होंने औरंगज़ेब और मुग़ल साम्राज्य को काफी कमज़ोर कर दिया था। अब इसके बाद मराठा साम्राज्य के जितने भी क्षेत्रीय नेता थे, उन सभी को संभाजी एक बैठक के लिए बुलाते हैं, और यह बैठक महाराष्ट्र के संगमेश्वर में रखी जाती है। अब संगमेश्वर के अंदर यह बैठक इसीलिए रखी गई है ताकि संभाजी सभी के साथ मिलकर आगे की लड़ाइयों की रणनीति बना सकें, और रणनीति बनाकर मराठा साम्राज्य की सेना को एक साथ किया जाए, और एक साथ मिलकर औरंगज़ेब के मुग़ल साम्राज्य पर हमला किया जाए। और अगर मराठा साम्राज्य ने ऐसा कर दिया, तो फिर वे लोग औरंगज़ेब को ज़रूर हरा देंगे, जिसके बाद जाकर वे पूरे भारत देश को मुग़ल साम्राज्य से स्वतंत्र करा देंगे, और फिर जाकर एक अखंड भारत का निर्माण होगा, और फिर उस अखंड भारत में स्वराज की स्थापना होगी, और इस तरह से संभाजी महाराज शिवाजी महाराज और पूरे मराठा साम्राज्य का सपना सच करेंगे।
इसी सोच को लेकर संभाजी संगमेश्वर में बैठक करते हैं, और हम यह देखते हैं कि इस बैठक के अंदर 250 योद्धा होते हैं, जिन सभी 250 योद्धाओं को संभाजी पहले प्रेरित करते हैं, और फिर सभी मिलकर अपनी बड़ी लड़ाई की रणनीति बनाते हैं। लेकिन अब इन सब के बाद रात होने पर वे लोग यहाँ पर सो जाते हैं, और सबके सोने पर कुछ योद्धा यहाँ पर पहरेदारी करते हैं। लेकिन जो लोग पहरेदारी कर रहे होते हैं, वे लोग यह देखते हैं कि उनके सामने से मुग़ल साम्राज्य की एक बड़ी सी सेना चलकर आ रही है। लेकिन जिस रास्ते से मुग़ल साम्राज्य के सैनिक आ रहे होते हैं, उस रास्ते को देखकर वे लोग काफी दंग रह जाते हैं, क्योंकि वह रास्ता असल में एक गुप्त मार्ग होता है, और इस रास्ते के बारे में सिर्फ़ मराठा साम्राज्य के योद्धाओं को ही पता होता है।
लेकिन फिर कुछ समय बाद ही वे लोग यह देखते हैं कि वे सभी मुग़ल सैनिक जो कि उनकी तरफ आ रहे हैं, उन सभी के साथ संभाजी के दोनों साले भी हैं। और इसीलिए उन दोनों को वहाँ पर देखकर वे सभी यह समझ जाते हैं कि संभाजी के दोनों सालों ने संभाजी और मराठा साम्राज्य के साथ विश्वासघात किया है, और वे दोनों औरंगज़ेब के साथ मिल गए हैं। और इसीलिए यह बात जानते ही वे लोग जल्दी से संभाजी के पास जाते हैं और उन्हें यह सारी बात बताकर सचेत करते हैं। उनके साथ-साथ वे सभी मराठा साम्राज्य के योद्धाओं को भी जगा देते हैं, जिसके बाद सबको स्थिति का पता लगता है।
अब यहाँ संगमेश्वर के अंदर कुल 250 मराठा योद्धा होते हैं, लेकिन जो मुग़ल साम्राज्य के सैनिक उनके सामने से आ रहे होते हैं, उनकी संख्या 5,000 की होती है। और इसीलिए उन सबको देखकर ये सभी मराठा योद्धा संभाजी से कहते हैं कि वे जल्दी से जल्दी यहाँ से निकल जाएँ और जल्दी से रायगढ़ जाएँ, क्योंकि संभाजी मराठा साम्राज्य के छत्रपति हैं, और इसीलिए उनका सही-सलामत रहना बहुत ज़रूरी है। और इसीलिए संभाजी को जल्दी से यहाँ से निकल जाना चाहिए। क्योंकि दोस्तों, हम यह भी देखते हैं कि यहाँ पर जो 5,000 के मुग़ल सैनिक होते हैं, उन सबके पास हर तरह के हथियार होते हैं, और वहीं पर जो मराठा योद्धा होते हैं, उनके पास सिर्फ़ और सिर्फ़ उनकी एक तलवार होती है।
लेकिन दोस्तों, यहाँ पर हम यह देखते हैं कि संभाजी यहाँ से जाने से मना कर देते हैं, और वह अपनी जगह एक दूसरे योद्धा को रायगढ़ भेज देते हैं, और उससे कहते हैं कि यहाँ पर जो भी हो रहा है, उस बारे में वहाँ पर जाकर सबको बता दो। और उसको भेजने के बाद वह अपने सभी योद्धाओं से यह कहते हैं कि “शायद आप सब यह भूल रहे हैं कि मैं एक शेर का बेटा हूँ, मैं एक छावा हूँ, और एक छावा कभी भी कुत्तों से नहीं डरता है, और इसीलिए मैं यहाँ रहकर इन सबका सामना करूँगा।” संभाजी की बात सुनकर सभी योद्धाओं के अंदर जोश आ जाता है, और इसीलिए वे सीधे संभाजी के साथ मिलकर लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं।
लेकिन फिर दोस्तों, देखते ही देखते हमला हो जाता है और मुग़ल सैनिक जल्दी-जल्दी करके संगमेश्वर के अंदर घुसने लगते हैं। और फिर हम यह देखते हैं कि दोनों तरफ़ के सैनिक एक दूसरे को मारने लगते हैं। लेकिन अब क्योंकि दोस्तों, मुग़ल सैनिक 5,000 होते हैं और मराठा सैनिक सिर्फ़ 250, वह भी अप्रस्तुत, इसीलिए इस लड़ाई के अंदर मराठा योद्धाओं की हार होने लगती है, और हम यह देखते हैं कि मराठा योद्धा धीरे-धीरे करके मरने लगते हैं। इसके बाद, कई घंटों की लड़ाई के बाद मराठा योद्धा लगभग ख़त्म हो जाते हैं, और अगर बचते हैं तो सिर्फ़ संभाजी और उनका एक दोस्त (कवि कलश)। लेकिन ये दोनों अभी भी बहादुरी से मुग़ल सैनिकों का सामना कर रहे होते हैं, और मुग़ल का कोई भी सैनिक संभाजी को छू भी नहीं पा रहा होता है।
लेकिन यहाँ पर भी संभाजी के दोनों साले मुग़ल सैनिकों को यह बता देते हैं कि उन लोगों को संभाजी को हराने के लिए उनके हाथों को जकड़ना होगा। और फिर यह बात जानते ही जो मुग़ल सैनिक होते हैं, वे जल्दी से कई सारी ज़ंजीरों का इस्तेमाल करते हैं और ज़ंजीर फेंक-फेंक कर संभाजी के दोनों हाथ और दोनों पैर को जकड़ लेते हैं। और फिर जब संभाजी ज़ंजीरों की वजह से कुछ नहीं कर पाते, तब मुग़ल सैनिक देखते ही देखते संभाजी को तलवार से काटने लगते हैं और उसे पूरी तरह से लहूलुहान कर देते हैं।
संभाजी का महा-बलिदान और फ़िल्म का अंत
इसके बाद, संभाजी को और उनके दोस्त कवि कलश दोनों को औरंगज़ेब के पास ले जाया जाता है। जहाँ पहुँचने के बाद ही औरंगज़ेब सबसे पहले कवि कलश को मरवा देता है और संभाजी को अपने सामने बंधवा देता है। और फिर वह संभाजी से अपने सामने हार मानने के लिए कहता है, लेकिन संभाजी औरंगज़ेब से हार नहीं मानते हैं। और इसीलिए औरंगज़ेब सबसे पहले संभाजी की देह के सभी नाखून फड़वा देता है, फिर उसके बाद वह उनकी दोनों आँखों में गर्म सरिया डालकर उनकी आँखें फुड़वा देता है, और फिर इसके बाद वह उनकी जीभ भी काट देता है। और इसी तरह से औरंगज़ेब संभाजी के साथ सभी ग़लत काम करता है, लेकिन तब भी संभाजी औरंगज़ेब के सामने घुटने नहीं टेकते हैं।
लेकिन कई दिनों तक इतना कुछ होने की वजह से संभाजी अपना देह त्याग कर देते हैं, यानी कि संभाजी की मृत्यु हो जाती है। पर अपने मरने तक भी वह औरंगज़ेब के सामने झुकते नहीं हैं। बाकी दोस्तों, इसके बाद ही हम मराठा साम्राज्य को देखते हैं, जहाँ पर हमें पता चलता है कि औरंगज़ेब ने अपने सभी सैनिकों का इस्तेमाल करके मराठा साम्राज्य के रायगढ़ को पूरी तरह से घेर लिया था, और इसी वजह से मराठा साम्राज्य के योद्धा संभाजी महाराज की मदद के लिए नहीं आ पाए थे। लेकिन जब संभाजी महाराज की मौत की ख़बर वहाँ पर पहुँचती है, तब सबको बहुत ज़्यादा दुख होता है। लेकिन फिर उसके बाद संभाजी के छोटे भाई राजाराव को नया छत्रपति बनाया जाता है।
अब यह ख़बर जैसी औरंगज़ेब को पता लगती है, वैसी यह ख़बर जिसने औरंगज़ेब को सुनाई होती है, औरंगज़ेब उसे चाकू मारकर जान से मार देता है। और फिर वह संभाजी महाराज की लाश के सामने आकर कहता है कि “मुझे शिवाजी से बहुत ज़्यादा जलन है, क्योंकि शिवाजी के घर में तुम जैसे शेर ने जन्म लिया था, संभाजी। काश तुम्हारे जैसा मेरा बेटा होता, क्योंकि अगर तुम्हारे जैसा मेरा बेटा होता, तो वह मेरे लिए पूरी दुनिया को जीत लेता।”
और फिर दोस्तों, हम यह देखते हैं कि इसके साथ ही यह “छावा” फ़िल्म यहीं पर समाप्त हो जाती है।
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